26 Sept 2008
भगतसिंह ने कहा... 'कानून की पवित्रता के बारे में...'
-- भगतसिंह के पत्र से
22 Sept 2008
भगतसिंह ने कहा... 'क्रान्तिकारी सिर्फ़ तर्क में विश्वास करते हैं...'
एक क्रान्तिकारी सबसे अधिक तर्क में विश्वास करता है। वह केवल तर्क और तर्क में ही विश्वास करता है। किसी प्रकार का गाली-गलौच या निन्दा, चाहे वह ऊँचे से ऊँचे स्तर से की गयी हो, उसे अपने निश्िचत उद्देश्य-प्राप्ति से वंचित नहीं कर सकती। यह सोचना कि यदि जनता का सहयोग न मिला या उसके कार्य की प्रशंसा न की गयी तो वह अपने उद्देश्य को छोड़ देगा, निरी मूर्खता है। अनेक क्रान्तिकारी, जिनके कार्यों की वैधानिक आन्दोलनकारियों ने घोर निन्दा की, फिर भी वे उसकी परवाह न कर फॉंसी के तख़्ते पर झूल गये। यदि तुम चाहते हो कि क्रान्तिकारी अपनी गतिविधियों को स्थगित कर दें तो उसके लिए होना तो यह चाहिए कि उनके साथ्ा तर्क द्वारा अपना मत प्रमाणित किया जाये। यह एक, और केवल यही एक रास्ता है, और बाक़ी बातों के विषय में किसी को सन्देह नहीं होना चाहिए। क्रान्तिकारी इस प्रकार के डराने-धमकाने से कदापि हार मानने वाला नहीं।
-- 'बम का दर्शन' लेख से
21 Sept 2008
भगतसिंह ने कहा... 'आम भारतीय को विदेशी पूँजीपतियों के साथ ही भारतीय पूँजीपतियों के हमलों से भी ख़्ातरा है'
भारतीय पूँजीपति भारतीय लोगों को धोखा देकर विदेशी पूँजीपति से विश्वासघात की क़ीमत के रूप में सरकार में कुछ हिस्सा प्राइज़ करना चाहता है। इसी कारण मेहनतकश की तमाम आशाऍं जब सिर्फ़ समाजवाद पर दिकी हैं और सिर्फ़ यही पूर्ण स्वराज्य और सब भेदभाव ख़्ात्म करने में सहायक साबित हो सकता है। देश का भविष्य नौजवानों के सहारे है। वही धरती के बेटे हैं।
-- 'हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन असोसिएशन' के घोषणापत्र से
19 Sept 2008
भगतसिंह ने कहा... 'अदालत एक ढकोसला है'
-- भगतसिंह
भगतसिंह ने कहा... 'ग़ुलामी की जंजीरें काटने के लिए संगठनबद्ध हो जाओ...'
-- भगतसिंह (अछूत समस्या पर एक लेख से)
16 Sept 2008
भगतसिंह ने कहा... 'कोरा विश्वास और अन्धविश्वास ख़्ातरनाक होता है...'
यथार्थवादी होने का दावा करने वाले को तो समूचे पुरातन विश्वास को चुनौती देनी होगी। यदि विश्वास विवेक की ऑंच बरदाश्त नहीं कर सकता तो ध्वस्त हो जायेगा। तब यथार्थवादी आदमी को सबसे पहले उस विश्वास के ढॉंचे को पूरी तरह गिरा कर उस जगह एक नया दर्शन खड़ा करने के लिए ज़मीन साफ़ करनी होगी।
-- भगतसिंह ('मैं नास्तिक क्यों हूँ' लेख से)
क्रान्ति से हमारा अभिप्राय...
समाज का मुख्य अंग होते हुए भी आज मज़दूरों को उनके प्राथमिक अधिकार से वंचित रखा जाता है और उनकी गाढ़ी कमाई का सारा धन पूँजीपति हड़प जाते हैं। दूसरों के अन्नदाता किसान आज अपने परिवार सहित दाने-दाने के लिए मुहताज हैं। दुनिया भर के बाज़ारों को कपड़ा मुहैया करने वाला बुनकर अपने तथा अपने बच्चों के तन ढँकने-भर को भी कपड़ा नहीं पा रहा है। सुन्दर महलों का निर्माण करने वाले राजगीर, लोहार तथा बढ़ई स्वयं गन्दे बाड़ों में रहकर ही अपनी जीवन-लीला समाप्त कर जाते हैं। इसके विपरीत समाज के जोंक शोषक पूँजीपति ज़रा-ज़रा-सी बात के लिए लाखों का वारा-न्यारा कर देते हैं।
यह भयानक असमानता और ज़बरदस्ती लादा गया भेदभाव दुनिया को एक बहुत भयानक उथल-पुथल की ओर लिए जा रहा है। यह स्थिति अधिक दिनों तक क़ायम नहीं रह सकती। स्पष्ट है कि आज का धनिक समाज एक भयानक ज्वालामुखी के मुख पर बैठकर रंगरेलियाँ मना रहा है और शोषकों के मासूम बच्चे तथा करोड़ों शोषित लोग एक भयानक खड्ड की कगार पर चल रहे हैं।
--- भगतसिंह ('बम काण्ड पर सेशन कोर्ट में बयान' से)
15 Sept 2008
देश को एक आमूल परविर्तन की आवश्यकता है...
-- भगतसिंह ('बम काण्ड पर सेशन कोर्ट में बयान' से)
12 Sept 2008
साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज
ऐसी स्थिति में हिन्दुस्तान का भविष्य बहुत अन्धकारमय नज़र आता है। इन ''धर्मों'' ने हिन्दुस्तान का बेड़ा ग़र्क कर दिया है। और अभी पता नहीं कि यह धार्मिक दंगे भारतवर्ष का पीछा कब छोड़ेंगे। इन दंगों ने संसार की नज़रों में भारत को बदनाम कर दिया है। और हमने देखा है इस अन्धविश्वास के बहाव में सभी बह जाते हैं। कोई बिरला ही हिन्दू, मुसलमान या सिख होता है, जो अपना दिमाग ठण्डा रखता है, बाक़ी सबके सब धर्म के ये नामलेवा अपने नामलेवा धर्म के रौब को क़ायम रखने के लिए डण्डे-लाठियॉं, तलवारें-छुरे हाथ में पकड़ लेते हैं और आपस में सिर फोड़-फोड़ कर मर जाते हैं। बाकी बचे कुछ तो फांसी चढ़ जाते हैं और कुछ जेलों में फेंक दिये जाते हैं। इतना रक्तपात होने पर इन ''धर्मजनों'' पर अंग्रेज़ी सरकार का डण्डा बरसता है और फिर इनके दिमाग का कीड़ा ठिकाने पर आ जाता है।
11 Sept 2008
अधिकार मांगने से नहीं मिलते, उनके लिए संघर्ष करना पड़ता है...
भगतसिंह ने कहा...
अधिकार मांगो नहीं। बढ़कर ले लो। और उन्हें किसी को भी तुम्हें देने मन दो यदि मुफ्त में तुम्हें कोई अधिकार दिया जाता है तो समझो कि उसमें कोई न कोई राज़ ज़रूर है। ज़्यादा सम्भावना यही है कि किसी गलत बात को उलट दिया गया है।
- शहीदेआज़म भगत की जेल नोटबुक से
9 Sept 2008
क्रान्ति की स्पिरिट...
जब गतिरोध की स्थिति लोगों को अपने शिकंजे में जकड़ लेती है तो किसी भी प्रकार की तब्दीली से वे हिचकिचाते हैं। इस जड़ता और निष्क्रियता को तोड़ने के लिए एक क्रान्तिकारी स्पिरिट पैदा करने की ज़रूरत होती है, अन्यथा पतन और बर्बादी का वातावरण छा जाता हैं। लोगों को गुमराह करने वाली प्रतिक्रियावादी शक्तियां जनता को ग़लत रास्ते पर ले जाने में सफल हो जाती हैं। इससे इन्सान की प्रगति रुक जाती है और उसमें गतिरोध आ जाता है। इस परिस्थिति को बदलने के लिए यह जरूरी है कि क्रान्ति की स्पिरिट ताज़ा की जाये, ताकि इन्सानियत की रूह में हरकत पैदा हो।
5 Sept 2008
विचार अमर होते हैं___
हम जनता का ध्यान इतिहास में बराबर दोहराये गये इस सबक़ की ओर दिलाना चाहते हैं कि ग़ुलामी और बेबसी से कराहती जनता को कुचलना आसान है, परन्तु विचार अमर होते हैं और दुनिया की कोई ताक़त उन्हें कुचल नहीं सकती। दुनिया में अनेक बड़े-बड़े साम्राज्य नष्ट हो गये, परन्तु जनसाधारण ने जिन विचारों से प्रेरित होकर इन्हें समाप्त किया वे आज भी जीवित हैं। बूरबों (फ्रांसीसी राजवंश) मिट गये, पर क्रान्तिकारी सीना ताने चल रहे हैं।
नौजवानों का कर्तव्य...
युवकों के सामने जो काम है, वह काफी कठिन है और उनके साधन बहुत थोड़े हैं। उनके मार्ग में बहुत सी बाधाएँ भी आ सकती हैं। लेकिन थोड़े किन्तु निष्ठावान व्यक्तियों की लगन उन पर विजय पा सकती है। युवकों को आगे जाना चाहिए। उनके सामने जो कठिन एवं बाधाओं से भरा हुआ मार्ग है, और उन्हें जो महान कार्य सम्पन्न करना है, उसे समझना होगा। उन्हें अपने दिल में यह बात रख लेनी चाहिए कि ''सफलता मात्र एक संयोग है, जबकि बलिदान एक नियम है।'' उनके जीवन अनवरत असफलताओं के जीवन हो सकते हैं - गुरु गोविन्द सिंह को आजीवन जिन नारकीय परिस्थितियों का सामना करना पड़ा था, हो सकता है उससे भी अधिक नारकीय परिस्थितियों का सामना करना पड़े। फिर भी उन्हें यह कहकर कि अरे, यह सब तो भ्रम था, पश्चाताप नहीं करना होगा।
नौजवान दोस्तो, इतनी बड़ी लड़ाई में अपने आपको अकेला पाकर हताश मत होना। अपनी शक्ति को पहचानो। अपने ऊपर भरोसा करो। सफलता आपकी है।
जीवन का उद्देश्य...
भगतसिंह ने कहा...
जीवन का उद्देश्य मन को नियंत्रित करना नहीं बल्कि उसका सुसंगत विकास करना है, मरने के बाद मोक्ष प्राप्त करना नहीं, बल्कि इस संसार में ही उसका सर्वोत्तम इस्तेमाल करना है, केवल ध्यान में ही नहीं, बल्िक दैनिक जीवन के यथार्थ अनुभव में भी सत्य, शिव और सुन्दर का साक्षात्कार करना है, सामाजिक प्रगति कुछेक की उन्नति पर नहीं, बल्कि बहुतों की समृद्धि पर निर्भर करती है, और आत्मिक जनतंत्र या सार्वभौमिक भ्रातृत्व केवल तभी प्राप्त किया जा सकता है, जब सामाजिक-राजनीतिक और आद्योगिक जीवन में अवसर की समानता हो।
- शहीदे आज़म भगतसिंह की जेल नोटबुक से