
11 Nov 2009
28 Sept 2008
स्मृति संकल्प यात्रा के तहत भगतसिंह के जन्मशताब्दी वर्ष के समापन पर जन्तर मन्तर पर एक विशाल जनसभा का आयोजन
शहीदे आज़म भगतसिंह के 101वें जन्मदिवस के अवसर पर दिशा छात्र संगठन, नौजवान भारत सभा, बिगुल मज़दूर दस्ता और नारी सभा ने आज दिल्ली के जन्तर मन्तर के पास एक विशाल जनसभा और सांस्कृतिक कार्यक्रम के जरिये भगतसिंह को याद किया और उनके सपनों को पूरा करने के लिए लड़ाई जारी रखने का संकल्प लिया। इस मौके पर क्रान्तिकारियों के जीवन और विचारों पर एक कलात्मक पोस्टर प्रदर्शनी और पुस्तक प्रदर्शनी भी लगाई गई थी।
उपरोक्त संगठनों के अलावा जागरूक नागरिक मंच और बादाम मज़दूर दस्ता के कार्यकर्ताओं सहित दिल्ली विश्वविद्यालय, नोएडा, गाजियाबाद, करावलनगर, झिलमिल इंडस्ट्रियल एरिया, बवाना-नरेला इंडस्ट्रियल एरिया, तुगलकाबाद, रोहिणी आदि दिल्ली और आसपास के इलाकों से बड़ी संख्या छात्र-नौजवान, मजदूर, महिलाएं और सामाजिक तथा सांस्कृतिककर्मी इस कार्यक्रम में शामिल हुए।
23 मार्च, 2005 को भगतसिंह और उनके साथियों के 75वें शहादत वर्ष के आरम्भ पर शुरू की गयी स्मृति संकल्प यात्रा के तहत ये संगठन पिछले तीन वर्षों से भगतसिंह के उस सन्देश पर अमल कर रहे हैं जो उन्होंने जेल की कालकोठरी से नौजवानों को दिया था कि - छात्रों और नौजवानों को क्रान्ति की अलख लेकर गांवों-कस्बों, कारखानों-दफ्तरों, झुग्गी बस्तियों तक जाना होगा।
पिछले 21 सितम्बर से इन सभी संगठनों की ओर से दिल्ली तथा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के साथ ही पंजाब में लुधियाना, चंडीगढ़, जालंधर आदि और गोरखपुर तथा लखनऊ में भगतसिंह स्मृति सप्ताह मनाया जा रहा था, जिसका समापन आज हुआ।
दिशा छात्र संगठन के अभिनव ने जनसभा को सम्बोधित करते हुए सवाल उठाया कि बर्तानवी गुलामी से आजादी के साठ वर्षों बाद देश आज कहां पहुंचा है? आंसुओं के सागर में समृद्धि के कुछ द्वीप, गरीबी, अभाव और यन्त्रणा के रेगिस्तान में विलासिता की कुछ मीनारें, ऊंची विकास-दर के शोर के बीच अकूत सम्पदा की ढेरी पर बैठे मुट्ठीभर परजीवी और दूसरी ओर शिक्षा और सुविधा तो दूर, बारह-चौदह घंटों तक हड्डियां गलाने के बावजूद दो जून की रोटी भी मुश्किल से जुटा पाने वाली 40 करोड़ आबादी, 20 करोड़ बेरोजगार युवा, करोड़ों भुखमरी के शिकार बच्चे, शरीर बेचने को बेबस लाखों स्त्रियां; दंगों और धार्मिक कट्टरपन्थ की फासिस्ट राजनीति, जाति के आधार पर आम मेहनतकश जनता को बांटने की साजिशें - यही है इक्कीसवीं सदी के चमकते चेहरे वाले भारत की तस्वीर। जाहिर है कि इस सड़े-गले ढांचे को मिट्टी में मिलाकर ही जनमुक्ति का स्वप्न साकार किया जा सकता है और एक नये भारत का निर्माण किया जा सकता है।
प्रसिद्ध कवयित्री कात्यायनी ने भारत और पूरे विश्व के बिगड़ते परिदृश्य का एक विहंगम दृश्यावलोकन प्रस्तुत किया। आज भगतसिंह को याद करने का एक ही मतलब है कि हम उनकी बताई हुई राह पर आगे बढ़े और उनके सपनों का हिन्दुस्तान बनाने के लिए एक लम्बी लड़ाई की तैयारियों में जुट जाएं। बड़ी संख्या में मेहनतकश औरतों और छात्राओं का विशेष रूप से आह्वान करते हुए उन्होंने कहा कि आजादी की लड़ाई से लेकर दुनियाभर में हुई क्रान्तियों का इतिहास इस बात का गवाह है कि आधी आबादी की शिरकत के बिना कोई भी सामाजिक बदलाव नहीं हो सकता।
जागरूक नागरिक मंच के सत्यम ने कहा कि यह वह भारत तो नहीं है जिसका सपना भगतसिंह ने देखा था। उन्होंने कहा कि भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने असेम्बली में जो बम फेंका था, वह मजदूरों के अधिकारों को और कम करने के लिए लाए गए ट्रेड डिस्प्यूट बिल और पब्लिक सेफ्टी बिल के विरोध में फेंका था। भगतसिंह ने बार-बार कहा था कि अगर आजादी के बाद गोरे अंग्रेजों की जगह काले अंग्रेज आ गए तो देश के किसानों-मजदूरों के लिए आजादी का कोई मतलब नहीं होगा। उन्होंने भगतसिंह के अधूरे सपने की याद दिलाई और नौजवानों से पूंजीवाद-साम्राज्यवाद विरोधी नई जनक्रान्ति की तैयारियों में जुट जाने का आह्वान किया।
नौजवान भारत सभा के योगेश ने देशभर में हुई स्मृति संकल्प यात्राओं के दौरान हुए अनुभवों को साझा किया और बताया कि इस दौरान हम नये जनमुक्ति संघर्ष की तैयारी के संकल्प और सन्देश को देश के कोने-कोने में पहुंचाते रहे।
बिगुल मजदूर दस्ता के प्रसेन ने, जो नरेला-बवाना की मजदूर बस्तियों में काम करते हैं, मजदूरों की समस्याओं और उनके जीवन के नारकीय हालात की तस्वीर पेश करते हुए कहा कि भगतसिंह के बताए रास्ते पर चलकर ही ऐसा समाज बनाया जा सकता है जिसमें हर मेहनतकश को बराबरी और इज्जत की जिन्दगी हासिल हो सकेगी।
बादाम मजदूर यूनियन के आशीष ने करावलनगर के बादाम मजदूरों के जीवन और संघर्षों की चर्चा करते हुए कहा कि मजदूरों ने अपने अनुभवों से खुद यह सीखा है कि इस पूंजीवादी व्यवस्था के भीतर उन्हें न्याय नहीं मिल सकता। पारम्परिक ट्रेड यूनियन आन्दोलन की सीमाएं और उसमें छाए हुए अवसरवादी और मौकापरस्त नेताओं की कारगुजारियां भी उनके सामने साफ हो चुकी हैं और उन्होंने यह समझ लिया है कि मजदूर आन्दोलन को एक क्रान्तिकारी मोड़ दिये बिना शहीदों के सपनों का भारत नहीं बनाया जा सकता! दिशा छात्र संगठन की शिवानी ने न सिर्फ छात्रों की समस्याओं को रखा बल्कि उन्होंने नौजवानों और छात्रों का मजदूरों के बीच जाकर काम करने का आह्वान भी किया। उन्होंने कहा कि मजदूरों, छात्रों, महिलाओं को अलग-अलग होकर नहीं बल्कि एकजुट होकर लड़ना होगा।
नारी सभा की मीनाक्षी ने कहा कि आज जब साम्प्रदायिक ताकतें भावनाएं भड़काकर लोगों को एक-दूसरे से लड़ाने में लगी हुई हैं तो भगतसिंह के विचार और भी प्रासंगिक हो गये हैं। उन्होंने कहा था कि लोगों को आपस में लड़ने से रोकने के लिए वर्ग चेतना की जरूरत होती है।
नौजवान भारत सभा, गाजियाबाद के तपीश मेंदोला ने कहा कि भगतसिंह का जीवन और उनके विचार एक जलती हुई मशाल की तरह हमें रास्ता दिखा रहे हैं। भगतसिंह के विचारों पर अमल करते हुए हिन्दुस्तान की व्यापक मेहनतकश आबादी की मुक्ति के लिए नौजवानों को आगे आना होगा।
बीच-बीच में विहान सांस्कृतिक मंच की टोली ने क्रान्तिकारी गीत प्रस्तुत किए। इंकलाब जिन्दाबाद, मजदूर एकता जिन्दाबाद, भगतसिंह का सपना आज भी अधूरा, मेहनतकश और नौजवान उसे करेंगे पूरा, नौजवान जब भी जागा इतिहास ने करवट बदली है, इसी सदी में नए वेग से परिवर्तन का ज्वार उठेगा... आदि नारों से लगभग चार घंटे चलने वाली इस जनसभा का पूरा माहौल गरमाया रहा। कार्यक्रम का संचालन दिशा छात्र संगठन के शिवार्थ ने किया।
जन्तर मन्तर पर चल रहे विभिन्न संगठनों के धरना-प्रदर्शनों में आए लोगों और वहां से गुजर रहे राहगीरों ने भी बड़ी संख्या में क्रान्तिकारियों के विचारों पर आधारित प्रदर्शनी को देखा और उनकी पुस्तकें और परचे लिए।
26 Sept 2008
भगतसिंह ने कहा... 'कानून की पवित्रता के बारे में...'
-- भगतसिंह के पत्र से
22 Sept 2008
भगतसिंह ने कहा... 'क्रान्तिकारी सिर्फ़ तर्क में विश्वास करते हैं...'
एक क्रान्तिकारी सबसे अधिक तर्क में विश्वास करता है। वह केवल तर्क और तर्क में ही विश्वास करता है। किसी प्रकार का गाली-गलौच या निन्दा, चाहे वह ऊँचे से ऊँचे स्तर से की गयी हो, उसे अपने निश्िचत उद्देश्य-प्राप्ति से वंचित नहीं कर सकती। यह सोचना कि यदि जनता का सहयोग न मिला या उसके कार्य की प्रशंसा न की गयी तो वह अपने उद्देश्य को छोड़ देगा, निरी मूर्खता है। अनेक क्रान्तिकारी, जिनके कार्यों की वैधानिक आन्दोलनकारियों ने घोर निन्दा की, फिर भी वे उसकी परवाह न कर फॉंसी के तख़्ते पर झूल गये। यदि तुम चाहते हो कि क्रान्तिकारी अपनी गतिविधियों को स्थगित कर दें तो उसके लिए होना तो यह चाहिए कि उनके साथ्ा तर्क द्वारा अपना मत प्रमाणित किया जाये। यह एक, और केवल यही एक रास्ता है, और बाक़ी बातों के विषय में किसी को सन्देह नहीं होना चाहिए। क्रान्तिकारी इस प्रकार के डराने-धमकाने से कदापि हार मानने वाला नहीं।
-- 'बम का दर्शन' लेख से
21 Sept 2008
भगतसिंह ने कहा... 'आम भारतीय को विदेशी पूँजीपतियों के साथ ही भारतीय पूँजीपतियों के हमलों से भी ख़्ातरा है'
भारतीय पूँजीपति भारतीय लोगों को धोखा देकर विदेशी पूँजीपति से विश्वासघात की क़ीमत के रूप में सरकार में कुछ हिस्सा प्राइज़ करना चाहता है। इसी कारण मेहनतकश की तमाम आशाऍं जब सिर्फ़ समाजवाद पर दिकी हैं और सिर्फ़ यही पूर्ण स्वराज्य और सब भेदभाव ख़्ात्म करने में सहायक साबित हो सकता है। देश का भविष्य नौजवानों के सहारे है। वही धरती के बेटे हैं।
-- 'हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन असोसिएशन' के घोषणापत्र से
19 Sept 2008
भगतसिंह ने कहा... 'अदालत एक ढकोसला है'
-- भगतसिंह
भगतसिंह ने कहा... 'ग़ुलामी की जंजीरें काटने के लिए संगठनबद्ध हो जाओ...'
-- भगतसिंह (अछूत समस्या पर एक लेख से)
16 Sept 2008
भगतसिंह ने कहा... 'कोरा विश्वास और अन्धविश्वास ख़्ातरनाक होता है...'
यथार्थवादी होने का दावा करने वाले को तो समूचे पुरातन विश्वास को चुनौती देनी होगी। यदि विश्वास विवेक की ऑंच बरदाश्त नहीं कर सकता तो ध्वस्त हो जायेगा। तब यथार्थवादी आदमी को सबसे पहले उस विश्वास के ढॉंचे को पूरी तरह गिरा कर उस जगह एक नया दर्शन खड़ा करने के लिए ज़मीन साफ़ करनी होगी।
-- भगतसिंह ('मैं नास्तिक क्यों हूँ' लेख से)
क्रान्ति से हमारा अभिप्राय...
समाज का मुख्य अंग होते हुए भी आज मज़दूरों को उनके प्राथमिक अधिकार से वंचित रखा जाता है और उनकी गाढ़ी कमाई का सारा धन पूँजीपति हड़प जाते हैं। दूसरों के अन्नदाता किसान आज अपने परिवार सहित दाने-दाने के लिए मुहताज हैं। दुनिया भर के बाज़ारों को कपड़ा मुहैया करने वाला बुनकर अपने तथा अपने बच्चों के तन ढँकने-भर को भी कपड़ा नहीं पा रहा है। सुन्दर महलों का निर्माण करने वाले राजगीर, लोहार तथा बढ़ई स्वयं गन्दे बाड़ों में रहकर ही अपनी जीवन-लीला समाप्त कर जाते हैं। इसके विपरीत समाज के जोंक शोषक पूँजीपति ज़रा-ज़रा-सी बात के लिए लाखों का वारा-न्यारा कर देते हैं।
यह भयानक असमानता और ज़बरदस्ती लादा गया भेदभाव दुनिया को एक बहुत भयानक उथल-पुथल की ओर लिए जा रहा है। यह स्थिति अधिक दिनों तक क़ायम नहीं रह सकती। स्पष्ट है कि आज का धनिक समाज एक भयानक ज्वालामुखी के मुख पर बैठकर रंगरेलियाँ मना रहा है और शोषकों के मासूम बच्चे तथा करोड़ों शोषित लोग एक भयानक खड्ड की कगार पर चल रहे हैं।
--- भगतसिंह ('बम काण्ड पर सेशन कोर्ट में बयान' से)
11 Sept 2008
अधिकार मांगने से नहीं मिलते, उनके लिए संघर्ष करना पड़ता है...
भगतसिंह ने कहा...
अधिकार मांगो नहीं। बढ़कर ले लो। और उन्हें किसी को भी तुम्हें देने मन दो यदि मुफ्त में तुम्हें कोई अधिकार दिया जाता है तो समझो कि उसमें कोई न कोई राज़ ज़रूर है। ज़्यादा सम्भावना यही है कि किसी गलत बात को उलट दिया गया है।
- शहीदेआज़म भगत की जेल नोटबुक से
5 Sept 2008
विचार अमर होते हैं___
हम जनता का ध्यान इतिहास में बराबर दोहराये गये इस सबक़ की ओर दिलाना चाहते हैं कि ग़ुलामी और बेबसी से कराहती जनता को कुचलना आसान है, परन्तु विचार अमर होते हैं और दुनिया की कोई ताक़त उन्हें कुचल नहीं सकती। दुनिया में अनेक बड़े-बड़े साम्राज्य नष्ट हो गये, परन्तु जनसाधारण ने जिन विचारों से प्रेरित होकर इन्हें समाप्त किया वे आज भी जीवित हैं। बूरबों (फ्रांसीसी राजवंश) मिट गये, पर क्रान्तिकारी सीना ताने चल रहे हैं।
छोटे भाई कुलतार सिंह के नाम भगतसिंह के अंतिम पत्र से...
हमें यह शौक़ है देखें सितम की इन्तहाँ क्या है।
दहर से क्यों ख़्ाफ़ा रहें, चर्ख़ का क्यों गिला करें,
सारा जहाँ अदू सही, आओ मुक़ाबला करें।
कोई दम का मेहमॉं हूँ ऐ अहले-महफ़िल,
चराग़े-सहर हूँ बुझा चाहता हूँ।
हवा में रहेगी मेरे ख़्ायाल की बिजली,
ये मुश्ते-ख़ाक़ है फानी, रहे रहे न रहे।
स्मृति संकल्प यात्रा का अंतिम चरण
छात्रों, नौजवानों, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और नागरिकों के एक छोटे से समूह के साथ शुरू हुई यह यात्रा आज देश के कई हिस्सों में फैल चुकी है। यात्रा से जुड़े कार्यकर्ताओं ने पर्चों, पस्तिकाओं, गीतों, नाटकों और हर संभव तरीके से देश की आम मेहनतकश आबादी के बीच क्रान्तिकारियों के विचारों का प्रचार प्रसार किया और अपने देश की उस सच्ची क्रन्तिकारी विरासत से लोगों को परिचित किया हमारे देशी हुक्मरानों ने आजादी के बाद से जिसे विस्मृति की गर्त में धकेलने का हर संभव प्रयास किया। देश की आम जनता तक भगतसिंह के विचारों को ले जाना आज और भी जरूरी है ताकि लोग समझ सकें कि भगतसिंह किस आजादी की बात करते थे और कांग्रेस के रास्ते से मिलने वाली आजादी के बारे में उन्होंने जो कुछ कहा था वह सब कितने नग्न रूप में आज हमारे सामने मौजूद है। देश और दुनिया के हालात हमें सोचने पर मजबूर कर रहे हैं कि जब तक सत्ता मेहनतकश वर्गों के हाथ में नहीं आ जाती जबतक उत्पादन और राजकाज पर देश की बहुलांश आबादी का अधिकार नहीं हो जाता तबतक असली आजादी हासिल नहीं की जा सकती।
स्मृति संकल्प यात्रा के अंतिम चरण में नौजवानों की टोलियां गली मुहल्लों, बस्तियों कारखानों और गांव गांव जाकर सीधे आम जनता के बीच क्रान्तिकारी विचारों का प्रचार कर रही हैं, भगतसिंह के संदेश को लोगों तक पहुंचा रही हैं। इस अभियान के तहत यात्रा टोलियां गली मोहल्लों में प्रभात फेरियां करती हैं, बसों, ट्रेनों, चौराहों और बाजारों में प्रचार अभियान चलाती हैं घर घर जाकर लोगों को जागृत करती हैं। अपने अपने क्षेत्रों में कार्यकर्ता परिचर्चाएं, गोष्ठियां और सेमिनार आयोजित करते हैं। क्रान्तिकारियों के जीवन से जुड़ी पुस्तकों और पोस्टरों की प्रदर्शनियां लगाते हैं। नुक्कड़ नाटकों, क्रान्तिकारी गीतों और अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों की श्रृंखला लगातार जारी है। इस दौरान अनेक क्षेत्रों में नौजवान भारत सभा और दिशा छात्र संगठन की इकाइयां गठित की गईं और नौजवानों ने क्रान्तिकारी विचारों पर चलने का संकल्प लिया। जेल की काल कोठरी से देश के नौजवानों के नाम भगतसिंह का यही अंतिम संदेश था।
हम सभी इंसाफपसंद लोगों से यह अपील करते हैं कि जन्मशताब्दी वर्ष के समापन के अवसर पर भगतसिंह और उनके सभी साथी क्रान्तिकारियों को सच्ची श्रद्धांजलि देने के लिए वे भी स्मृति संकल्प यात्रा के तहत किए जाने वाले कार्यक्रमों में भागीदारी करें और इस आन्दोलन को आगे बढ़ाने के लिए हर संभव सहयोग करें।
स्मृति संकल्प यात्रा के अंतिम चरण में रोज रोज चलाये जा रहे क्रान्तिकारी प्रचार अभियानों के अलावा क्रान्तिकारी विरासत से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण पुस्तकों का विमोचन किया जायेगा पुस्तक और पोस्टर प्रदर्शनियां आयोजित की जायेंगी तथा अन्य कार्यक्रम आयोजित किए जायेंगे। इन कार्यक्रमों की नियमित जानकारी के लिए कृपया इस ब्लाग को देखते रहें।