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28 Sept 2008

स्‍मृति संकल्‍प यात्रा के तहत भगतसिंह के जन्‍मशताब्‍दी वर्ष के समापन पर जन्‍तर मन्‍तर पर एक विशाल जनसभा का आयोजन








शहीदे आज़म भगतसिंह के 101वें जन्‍मदिवस के अवसर पर दिशा छात्र संगठन, नौजवान भारत सभा, बिगुल मज़दूर दस्‍ता और नारी सभा ने आज दिल्‍ली के जन्‍तर मन्‍तर के पास एक विशाल जनसभा और सांस्‍कृतिक कार्यक्रम के जरिये भगतसिंह को याद किया और उनके सपनों को पूरा करने के लिए लड़ाई जारी रखने का संकल्‍प लिया। इस मौके पर क्रान्तिकारियों के जीवन और विचारों पर एक कलात्‍मक पोस्‍टर प्रदर्शनी और पुस्‍तक प्रदर्शनी भी लगाई गई थी।

उपरोक्‍त संगठनों के अलावा जागरूक नागरिक मंच और बादाम मज़दूर दस्‍ता के कार्यकर्ताओं सहित दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय, नोएडा, गाजियाबाद, करावलनगर, झिलमिल इंडस्ट्रियल एरिया, बवाना-नरेला इंडस्ट्रियल एरिया, तुगलकाबाद, रोहिणी आदि दिल्‍ली और आसपास के इलाकों से बड़ी संख्‍या छात्र-नौजवान, मजदूर, महिलाएं और सामाजिक तथा सांस्‍कृतिककर्मी इस कार्यक्रम में शामिल हुए।

23 मार्च, 2005 को भगतसिंह और उनके सा‍थियों के 75वें शहादत वर्ष के आरम्‍भ पर शुरू की गयी स्‍मृति संकल्‍प यात्रा के तहत ये संगठन पिछले तीन वर्षों से भगतसिंह के उस सन्‍देश पर अमल कर रहे हैं जो उन्‍होंने जेल की कालकोठरी से नौजवानों को दिया था कि - छात्रों और नौजवानों को क्रान्ति की अलख लेकर गांवों-कस्‍बों, कारखानों-दफ्तरों, झुग्‍गी बस्तियों तक जाना होगा।

पिछले 21 सितम्‍बर से इन सभी संगठनों की ओर से दिल्‍ली तथा राष्‍ट्रीय राजधानी क्षेत्र के साथ ही पंजाब में लुधियाना, चंडीगढ़, जालंधर आदि और गोरखपुर तथा लखनऊ में भगतसिंह स्‍मृति सप्‍ताह मनाया जा रहा था, जिसका समापन आज हुआ।

दिशा छात्र संगठन के अभिनव ने जनसभा को सम्‍बोधित करते हुए सवाल उठाया कि बर्तानवी गुलामी से आजादी के साठ वर्षों बाद देश आज कहां पहुंचा है? आंसुओं के सागर में समृद्धि के कुछ द्वीप, गरीबी, अभाव और यन्‍त्रणा के रेगिस्‍तान में विलासिता की कुछ मीनारें, ऊंची विकास-दर के शोर के बीच अकूत सम्‍पदा की ढेरी पर बैठे मुट्ठीभर परजीवी और दूसरी ओर शिक्षा और सुविधा तो दूर, बारह-चौदह घंटों तक हड्डियां गलाने के बावजूद दो जून की रोटी भी मुश्किल से जुटा पाने वाली 40 करोड़ आबादी, 20 करोड़ बेरोजगार युवा, करोड़ों भुखमरी के शिकार बच्‍चे, शरीर बेचने को बेबस लाखों स्त्रियां; दंगों और धार्मिक कट्टरपन्‍थ की फासिस्‍ट राजनीति, जाति के आधार पर आम मेहनतकश जनता को बांटने की साजिशें - यही है इक्‍कीसवीं सदी के चमकते चेहरे वाले भारत की तस्‍वीर। जाहिर है कि इस सड़े-गले ढांचे को मिट्टी में मिलाकर ही जनमुक्ति का स्‍वप्‍न साकार किया जा सकता है और एक नये भारत का निर्माण किया जा सकता है।

प्रसिद्ध कव‍यित्री कात्‍यायनी ने भारत और पूरे विश्‍व के बिगड़ते परिदृश्‍य का एक विहंगम दृश्‍यावलोकन प्रस्‍तुत किया। आज भगतसिंह को याद करने का एक ही मतलब है कि हम उनकी बताई हुई राह पर आगे बढ़े और उनके सपनों का हिन्‍दुस्‍तान बनाने के लिए एक लम्‍बी लड़ाई की तैयारियों में जुट जाएं। बड़ी संख्‍या में मेहनतकश औरतों और छात्राओं का विशेष रूप से आह्वान करते हुए उन्‍होंने कहा कि आजादी की लड़ाई से लेकर दुनियाभर में हुई क्रान्तियों का इतिहास इस बात का गवाह है कि आधी आबादी की शिरकत के बिना कोई भी सामाजिक बदलाव नहीं हो सकता।

जागरूक नागरिक मंच के सत्‍यम ने कहा कि यह वह भारत तो नहीं है जिसका सपना भगतसिंह ने देखा था। उन्‍होंने कहा कि भगतसिंह और बटुकेश्‍वर दत्त ने असेम्‍बली में जो बम फेंका था, वह मजदूरों के अधिकारों को और कम करने के लिए लाए गए ट्रेड डिस्‍प्‍यूट बिल और पब्लिक सेफ्टी बिल के विरोध में फेंका था। भगतसिंह ने बार-बार कहा था कि अगर आजादी के बाद गोरे अंग्रेजों की जगह काले अंग्रेज आ गए तो देश के किसानों-मजदूरों के लिए आजादी का कोई मतलब नहीं होगा। उन्‍होंने भगतसिंह के अधूरे सपने की याद दिलाई और नौजवानों से पूंजीवाद-साम्राज्‍यवाद विरोधी नई जनक्रान्ति की तैयारियों में जुट जाने का आह्वान किया।

नौजवान भारत सभा के योगेश ने देशभर में हुई स्‍मृति संकल्‍प यात्राओं के दौरान हुए अनुभवों को साझा किया और बताया कि इस दौरान हम नये जनमुक्ति संघर्ष की तैयारी के संकल्‍प और सन्‍देश को देश के कोने-कोने में पहुंचाते रहे।

बिगुल मजदूर दस्‍ता के प्रसेन ने, जो नरेला-बवाना की मजदूर बस्तियों में काम करते हैं, मजदूरों की समस्‍याओं और उनके जीवन के नारकीय हालात की तस्‍वीर पेश करते हुए कहा कि भगतसिंह के बताए रास्‍ते पर चलकर ही ऐसा समाज बनाया जा सकता है जिसमें हर मेहनतकश को बराबरी और इज्‍जत की जिन्‍दगी हासिल हो सकेगी।

बादाम मजदूर यूनियन के आशीष ने करावलनगर के बादाम मजदूरों के जीवन और संघर्षों की चर्चा करते हुए कहा कि मजदूरों ने अपने अनुभवों से खुद यह सीखा है कि इस पूंजीवादी व्‍यवस्‍था के भीतर उन्‍हें न्‍याय नहीं मिल सकता। पारम्‍परिक ट्रेड यूनियन आन्‍दोलन की सीमाएं और उसमें छाए हुए अवसरवादी और मौकापरस्‍त नेताओं की कारगुजारियां भी उनके सामने साफ हो चुकी हैं और उन्‍होंने यह समझ लिया है कि मजदूर आन्‍दोलन को एक क्रान्तिकारी मोड़ दिये बिना शहीदों के सपनों का भारत नहीं बनाया जा सकता! दिशा छात्र संगठन की शिवानी ने न सिर्फ छात्रों की समस्‍याओं को रखा बल्कि उन्‍होंने नौजवानों और छात्रों का मजदूरों के बीच जाकर काम करने का आह्वान भी किया। उन्‍होंने कहा कि मजदूरों, छात्रों, महिलाओं को अलग-अलग होकर नहीं बल्कि एकजुट होकर लड़ना होगा।

नारी सभा की मीनाक्षी ने कहा कि आज जब साम्‍प्रदायिक ताकतें भावनाएं भड़काकर लोगों को एक-दूसरे से लड़ाने में लगी हुई हैं तो भगतसिंह के विचार और भी प्रासंगिक हो गये हैं। उन्‍होंने कहा था कि लोगों को आपस में लड़ने से रोकने के लिए वर्ग चेतना की जरूरत होती है।

नौजवान भारत सभा, गाजियाबाद के तपीश मेंदोला ने कहा कि भगतसिंह का जीवन और उनके विचार एक जलती हुई मशाल की तरह हमें रास्‍ता दिखा रहे हैं। भगतसिंह के विचारों पर अमल करते हुए हिन्‍दुस्‍तान की व्‍यापक मेहनतकश आबादी की मुक्ति के लिए नौजवानों को आगे आना होगा।

बीच-बीच में विहान सांस्‍कृतिक मंच की टोली ने क्रान्तिकारी गीत प्रस्‍तुत किए। इंकलाब जिन्‍दाबाद, मजदूर एकता जिन्‍दाबाद, भगतसिंह का सपना आज भी अधूरा, मेहनतकश और नौजवान उसे करेंगे पूरा, नौजवान जब भी जागा इतिहास ने करवट बदली है, इसी सदी में नए वेग से परिवर्तन का ज्‍वार उठेगा... आदि नारों से लगभग चार घंटे चलने वाली इस जनसभा का पूरा माहौल गरमाया रहा। कार्यक्रम का संचालन दिशा छात्र संगठन के शिवार्थ ने किया।

जन्‍तर मन्‍तर पर चल रहे विभिन्‍न संगठनों के धरना-प्रदर्शनों में आए लोगों और वहां से गुजर रहे राहगीरों ने भी बड़ी संख्‍या में क्रान्तिकारियों के विचारों पर आधारित प्रदर्शनी को देखा और उनकी पुस्‍तकें और परचे लिए।



22 Sept 2008

आमन्‍त्रण 'भगतसिंह एक क्रान्तिकारी विचारक' व्‍याख्‍यान डा. एस. इरफ़ान हबीब दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय

शहीद भगतसिंह
के जन्‍मश‍ताब्‍दी वर्ष (28 सितम्‍बर 2007 - 28 सितम्‍बर 2008)
के अवसर पर
प्रसिद्ध इतिहासकार और लेखक
एस. इरफ़ान हबीब
के व्‍याख्‍यान
भगतसिंह एक क्रान्तिकारी विचारक
में आप सादर आमन्त्रित हैं!
23 सितम्‍बर, मंगलवार 11.30 पूर्वान्‍ह
स्‍टूडेण्‍ट्स ऐक्टिविटी सेण्‍टर, आर्ट्स फैकल्‍टी
दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय
दिशा छात्र संगठन
संपर्क : अभिनव सिन्‍हा (9999379381), शिवानी (9911055517),
श्‍वेता (9891859047), शिवार्थ (999951235)
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डा. एस. इरफ़ान हबीब नेशनल इंस्‍टीट्यूट ऑफ़ साइंस, टेक्‍नोलॉजी ऐण्‍ड डेवेलपमेण्‍ट स्‍टडीज़ (एनआईएसटीएडीएस), दिल्‍ली में कार्यरत हैं। उनकी पुस्‍तक 'बहरों को सुनाने के लिए' राष्‍ट्रवादी क्रान्तिकारियों और भारत के स्‍वतन्‍त्रता संग्राम में उनकी भूमिका पर अबतक उपलब्‍ध
सबसे बेहतरीन किताबों में मानी जाती है।
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भगतसिंह ने कहा... 'क्रान्तिकारी सिर्फ़ तर्क में विश्‍वास करते हैं...'

एक क्रान्तिकारी सबसे अधिक तर्क में विश्‍वास करता है। वह केवल तर्क और तर्क में ही विश्‍वास करता है। किसी प्रकार का गाली-गलौच या निन्‍दा, चाहे वह ऊँचे से ऊँचे स्‍तर से की गयी हो, उसे अपने निश्‍ि‍चत उद्देश्‍य-प्राप्ति से वंचित नहीं कर सकती। यह सोचना कि यदि जनता का सहयोग न मिला या उसके कार्य की प्रशंसा न की गयी तो वह अपने उद्देश्‍य को छोड़ देगा, निरी मूर्खता है। अनेक क्रान्तिकारी, जिनके कार्यों की वैधानिक आन्‍दोलनकारियों ने घोर निन्‍दा की, फिर भी वे उसकी परवाह न कर फॉंसी के तख्‍़ते पर झूल गये। यदि तुम चाहते हो कि क्रान्तिकारी अपनी गतिविधियों को स्‍थगित कर दें तो उसके लिए होना तो यह चाहिए कि उनके साथ्‍ा तर्क द्वारा अपना मत प्रमाणित किया जाये। यह एक, और केवल यही एक रास्‍ता है, और बाक़ी बातों के विषय में किसी को सन्‍देह नहीं होना चाहिए। क्रान्तिकारी इस प्रकार के डराने-धमकाने से कदापि हार मानने वाला नहीं।

-- 'बम का दर्शन' लेख से

21 Sept 2008

भगतसिंह ने कहा... 'आम भारतीय को विदेशी पूँजीपतियों के साथ ही भारतीय पूँजीपतियों के हमलों से भी ख्‍़ातरा है'

भारत साम्राज्‍यवाद के जुवे के नीचे पिस रहा है। इसमें करोड़ों लोग आज अज्ञानता और ग़रीबी के शिकार हो रहे हैं। भारत की बहुत बड़ी जनसंख्‍या जो मज़दूरों और किसानों की है, उनको विदेशी दबाव एवं आर्थिक लूट ने पस्‍त कर दिया है। भारत के मेहनतकश वर्ग की हालत आज बहुत गम्‍भीर है। उसके सामने दोहरा ख्‍़ातरा है - विदेशी पूँजीवाद के धोखे भरे हमले का दूसरी तरफ़ से और भारतीय पूँजीवाद के धोखे भरे हमले का दूसरे तरफ़ से। भारतीय पूँजीवाद विदेशी पूँजी के साथ हर रोज़ बहुत से गँठजोड़ कर रहा है।...

भारतीय पूँजीपति भारतीय लोगों को धोखा देकर विदेशी पूँजीपति से विश्‍वासघात की क़ीमत के रूप में सरकार में कुछ हिस्‍सा प्राइज़ करना चाहता है। इसी कारण मेहनतकश की तमाम आशाऍं जब सिर्फ़ समाजवाद पर दिकी हैं और सिर्फ़ यही पूर्ण स्‍वराज्‍य और सब भेदभाव ख्‍़ात्‍म करने में सहायक साबित हो सकता है। देश का भविष्‍य नौजवानों के सहारे है। वही धरती के बेटे हैं।

-- 'हिन्‍दुस्‍तान सोशलिस्‍ट रिपब्लिकन असोसिएशन' के घोषणापत्र से

19 Sept 2008

भगतसिंह ने कहा... 'अदालत एक ढकोसला है'

... हमारा यह भी विश्‍वास है कि साम्राज्‍यवाद एक बड़ी डाकेजनी की साजि़श के अलावा कुछ नहीं। साम्राज्‍यवाद मनुष्‍य के हाथों मनुष्‍य के और राष्‍ट्र के हाथों राष्‍ट्र के शोषण का चरम है। साम्राज्‍यवादी अपने हितों, और लूटने की योजनाओं को पूरा करने के लिए न सिर्फ़ न्‍यायालयों एवं कानून को कत्‍ल करते हैं, बल्कि भयंकर हत्‍याकाण्‍ड भी आयोजित करते हैं। अपने शोषण को पूरा करने के लिए जंग-जैसे ख़ौफ़नाक अपराध भी करते हैं। जहॉं कहीं लोग उनकी नादिरशाही शोषणकारी मॉंगों को स्‍वीकार न करें या चुपचाप उनकी ध्‍वस्‍त कर देनेवाली और घृणा योग्‍य साजिशों को मानने से इनकार कर दें तो यह निरपराधियों का ख़ून बहाने से संकोच नहीं करते। शान्ति-व्‍यवस्‍था की आड़ में वे शान्ति-व्‍यवस्‍था भंग करते हैं। भगदड़ मचाते हुए लोगों की हत्‍या, अर्थात हर सम्‍भव दमन करते हैं।

-- भगतसिंह

16 Sept 2008

भगतसिंह ने कहा... 'कोरा विश्‍वास और अन्‍धविश्‍वास ख्‍़ातरनाक होता है...'

प्रगति के समर्थक प्रत्‍येक व्‍यक्ति के लिए यह अनिवार्य है कि वह पुराने विश्‍वास से सम्‍बन्धित हर बात की आलोचना करे, उसमें अविश्‍वास करे और उसे चुनौती दे। प्रचलित विश्‍वास की एक-एक बात के हर कोने-अंतरे की विवेकपूर्ण जॉंच-पड़ताल उसे करनी होगी। यदि कोई विवेकपूर्ण ढंग से पर्याप्‍त सोच विचार के बाद किसी सिद्धान्‍त या दर्शन में विश्‍वास करता है तो उसके विश्‍वास का स्‍वागत है। उसकी तर्क-पद्धति भ्रान्तिपूर्ण, ग़लत, पथ-भ्रष्‍ट और कदाचित हेत्‍वाभासी हो सकती है, लेकिन ऐसा आदमी सुधर कर सही रास्‍ते पर आ सकता है, क्‍योंकि विवेक का ध्रुवतारा सही रास्‍ता बनाता हुआ उसके जीवन में चमकता रहता है। मगर कोरा विश्‍वास और अन्‍धविश्‍वास ख्‍़ातरनाक होता है। क्‍योंकि वह दिमाग़ को कुन्‍द करता है और आदमी को प्रतिक्रियावादी बना देता है।

यथार्थवादी होने का दावा करने वाले को तो समूचे पुरातन विश्‍वास को चुनौती देनी होगी। यदि विश्‍वास विवेक की ऑंच बरदाश्‍‍त नहीं कर सकता तो ध्‍वस्‍त हो जायेगा। तब यथार्थवादी आदमी को सबसे पहले उस विश्‍वास के ढॉंचे को पूरी तरह गिरा कर उस जगह एक नया दर्शन खड़ा करने के लिए ज़मीन साफ़ करनी होगी।

-- भगतसिंह ('मैं नास्तिक क्‍यों हूँ' लेख से)

क्रान्ति से हमारा अभिप्राय...

क्रान्ति से हमारा अभिप्राय है - अन्‍याय पर आधारित मौजूदा समाज-व्‍यवस्‍था में आमूल परिवर्तन।
समाज का मुख्‍य अंग होते हुए भी आज मज़दूरों को उनके प्राथमिक अधिकार से वंचित रखा जाता है और उनकी गाढ़ी कमाई का सारा धन पूँजीपति हड़प जाते हैं। दूसरों के अन्‍नदाता किसान आज अपने परिवार सहित दाने-दाने के लिए मुहताज हैं। दुनिया भर के बाज़ारों को कपड़ा मुहैया करने वाला बुनकर अपने तथा अपने बच्‍चों के तन ढँकने-भर को भी कपड़ा नहीं पा रहा है। सुन्‍दर महलों का निर्माण करने वाले राजगीर, लोहार तथा बढ़ई स्‍वयं गन्‍दे बाड़ों में रहकर ही अपनी जीवन-लीला समाप्‍त कर जाते हैं। इसके विपरीत समाज के जोंक शोषक पूँजीपति ज़रा-ज़रा-सी बात के लिए लाखों का वारा-न्‍यारा कर देते हैं।
यह भयानक असमानता और ज़बरदस्‍ती लादा गया भेदभाव दुनिया को एक बहुत भयानक उथल-पुथल की ओर लिए जा रहा है। यह स्थिति अधिक दिनों तक क़ायम नहीं रह सकती। स्‍पष्‍ट है कि आज का धनिक समाज एक भयानक ज्‍वालामुखी के मुख पर बैठकर रंगरेलियाँ मना रहा है और शोषकों के मासूम बच्‍चे तथा करोड़ों शोषित लोग एक भयानक खड्ड की कगार पर चल रहे हैं।
--- भगतसिंह ('बम काण्‍ड पर सेशन कोर्ट में बयान' से)

11 Sept 2008

अधिकार मांगने से नहीं मिलते, उनके लिए संघर्ष करना पड़ता है...

भगतसिंह ने कहा...

अधिकार मांगो नहीं। बढ़कर ले लो। और उन्‍हें किसी को भी तुम्‍हें देने मन दो यदि मुफ्त में तुम्हें कोई अधिकार दिया जाता है तो समझो कि उसमें कोई न कोई राज़ ज़रूर है। ज्‍़यादा सम्‍भावना यही है कि किसी गलत बात को उलट दिया गया है।

- शहीदेआज़म भगत की जेल नोटबुक से

9 Sept 2008

क्रान्ति की स्पिरिट...

भगतसिंह ने कहा...
जब गतिरोध की स्थिति लोगों को अपने शिकंजे में जकड़ लेती है तो किसी भी प्रकार की तब्‍दीली से वे हिचकिचाते हैं। इस जड़ता और निष्क्रियता को तोड़ने के लिए एक क्रान्तिकारी स्पिरिट पैदा करने की ज़रूरत होती है, अन्‍यथा पतन और बर्बादी का वातावरण छा जाता हैं। लोगों को गुमराह करने वाली प्रतिक्रियावादी शक्तियां जनता को ग़लत रास्‍ते पर ले जाने में सफल हो जाती हैं। इससे इन्‍सान की प्रगति रुक जाती है और उसमें गतिरोध आ जाता है। इस परिस्थिति को बदलने के लिए यह जरूरी है कि क्रान्ति की स्पिरिट ताज़ा की जाये, ताकि इन्‍सानियत की रूह में हरकत पैदा हो।